वो सहमी सी आँखें …


मेट्रो में हमेशा की तरह शनिवार को बहुत ज्यादा भीड़ थी … मै नॉएडा जा रहा था अपने दोस्त से मिलने. earphones कान में लगाये हुए मै मोहित चौहान के गाने सुन रहा था और साथ ही ऊपर लगी हुई rod को कास कर पकड़ा हुआ था सह यात्रियों के धक्कों से बचने के लिए. अचानक मेरी नज़र मेट्रो के गेट के पास सहमे से खड़े हुए लड़के पर पड़ी. बाल बिखरे हुए थे … चेहरे पर काफी धूल थी. अक्सर ऐसे चेहरे नहीं दीखते मेट्रो में. तो वो लड़का तुरंत मेरी नज़रों में आ गया. मुझे वो मजदूरों के वर्ग से आता हुआ लगा. उसके हाथ में एक पुराना फटा हुआ बैग था जिसे वो एक हाथ से अपने सीने से लगाये हुए था और दूसरे हाथ से गेट का handle पकडे हुए था. उम्र रही होगी यही कोई १५-१६ साल. पटेल चौक मेट्रो स्टेशन निकल चुका था . मै खुद को तैयार कर रहा था राजीव चौक पे लगने वाले धक्कों के लिए. अक्सर मेट्रो के drivers राजीव चौक पे smoothly गाडी नहीं रोकते … गाडी रूकती है कुछ धक्कों के साथ. उस मजदूर से लगने वाले लड़के के पास ही एक couple खड़ा हुआ था … अपनी ही दुनिया में मशगूल … ऐसे नज़ारे आम होते हैं … देखने में किसी संभ्रांत परिवार से लग रहे थे. इसी बीच मेरे मोबाइल पर मोहित का नया गाना शुरू हुआ …”ये दूरियां”. मेरे favorites में से एक है ये गाना. अचानक एक तेज़ झटका लगा , ड्राईवर ने अकस्मात् ब्रेक लगाये. और जो लड़की उस मजदूर से दिखने वाले लड़के के पास खड़ी थी, उसका संतुलन बिगड़ा और उस १५-१६ साल के लड़के ने अपना हाथ लगाया उस लड़की को गिरने से बचाने को. मैंने सुना … लड़के के मुंह से धीरे से निकला था “देख के दीदी जी “. इधर उस लड़की के boyfriend ने ना आव देखा ना ताव एक झापड़ रसीद कर दिया उस लड़के को. वो लड़का हक्का बक्का था कि उसने  ऐसा क्या गलत किया. उसकी आँखों में आंसू थे शायद अपमान के. उन आँखों को देख के मानो अन्दर से कुछ टूटता हुआ लगा. वो सहमी सी आँखें … मै बयाँ नहीं कर सकता यहाँ.  राजीव चौक आया और वो लड़का वहां उतरने वाली भारी भीड़ में ही कही खो गया. मुझे भी नॉएडा जाना था सो मै भी वहां उतर गया. कानों में अभी भी ear phone लगा हुआ था और वही गाना चल रहा था “ये दूरियां”. अब इस गाने का अलग ही सन्दर्भ था मेरे लिए … लड़के के गाल पे लगा वो चांटा मानो इस बात का प्रतीक था की देखो तुम मजदूर हो , गरीब हो,  असमर्थ हो तो गलत हो.  ये तमाचा सिर्फ उस लड़के के मुंह पर नहीं हमारे समाज पर था. जो दंभ भरता है civilized होने का, पड़े लिखे होने का.

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